पलामू में पानी पीने का शौक, जंगल में क्यों 14 घंटे की कमाई टीम

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पलामू समाचार: भीषण गर्मी में जब जंगल के जल संसाधन शामिल हैं, तब विशाल पानी की तलाश में तय जगह पर भंडार हैं। इसी दौरान पलामू टाइगर रिजर्व में सम्राटों की गिनती और निगरानी के लिए विशेष वॉटरहोल सेंसस स्थापित किया गया। ये बेहतरीन तरीका है जिससे यूनिट की गिनती की जाती है और डेटा इकट्ठा किया जाता है।

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पलामू. भीषण गर्मी के मौसम में जब जंगल के अधिकांश जलस्रोत स्थित होते हैं, तब विशाल जल की तलाश में सीमित जलस्रोतों की ओर रुख होता है। इसी अवसर का उपयोग कर पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) में स्मारकों की निगरानी और उनकी संख्या का आकलन करने के लिए पारंपरिक वॉटरहोल गणना (वाटरहोल सेंसस) की जाती है। इस बार भी ‘वाटरहोल गणना 2026’ का आयोजन किया गया, जिसमें वन आध्यात्म और स्वयंसेवकों ने मिलकर वर्ष 14 घंटे तक कॉन्स्टेंट जंगल के विभिन्न जल स्रोतों पर नजर रखी।

इसी क्षेत्र से शुरू हुई थी बाघों की गणना
पलामू टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जैना ने बताया कि पलामू टाइगर रिजर्व का एक खास इतिहास रहा है। भारत में बाघों की गणना की शुरुआत भी इसी क्षेत्र से हुई थी। पुरातात्विक अध्ययनों और संरक्षण के क्षेत्र में पलामू में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने बताया कि वॉटरहोल सेन्सास स्टोन्स की देखरेख एक पारंपरिक और वैज्ञानिक विधि है, जिसका उपयोग आज भी प्रभावी रूप से किया जा रहा है।

पानी पीने आते हैं, तब होता है अनुमान
उन्होंने कहा कि यह एक आदर्श व्यक्तित्व है, जो मुख्य रूप से गर्मी के दिनों में आयोजित किया जाता है। इस दौरान जंगल के जानवर पानी पीने के लिए तय जलस्रोतों पर आते हैं। ऐसे में वन विभाग के कर्मचारी और प्रशिक्षण कार्यकर्ता मचानों और बूथ स्थित ठिकानों से उनकी चोरी पर नजर रखी जाती है। इससे जुड़ी जानकारी में बताया गया है कि किस-किस का जल स्रोत किस संख्या में आता है, कितनी संख्या में आता है और उसका समय क्या होता है।

आसान हो जाती है गिनती
गणना के दौरान हर वॉटरहोल पर विशेष डेटा शेयर उपलब्ध कराया गया था, जिसमें सामानों के आने का समय, स्ट्रक्चर, नर-मादा और शावकों की संख्या सहित अन्य आवश्यक जानकारी दर्ज की गई थी। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार हाथी, तेंदुआ, गौर, चीतल, सांभर, कोटरा, भालू और सियार जैसे कई महत्वपूर्ण तत्वों की प्रविष्टि की गई है। इसी तरह जंगल के जंगल की गणना करना सबसे आसान हो जाता है।

सबसे भरोसेमंद नुस्खा माना जाता है
वन अधिकारियों का मानना ​​है कि इस तरह की गणना से न केवल खनिजों के वर्गीकरण का आकलन होता है, बल्कि यह भी पता चलता है कि कौन से जलस्रोतों के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। कृत्रिम जल आपूर्ति की व्यवस्था और शिकार अभियान को मजबूत बनाने में सहायक प्रबंधन साबित होगा। इसका कारण यह है कि वॉटरहोल की गणना आज भी आदर्श संरक्षण की सबसे विश्वसनीय पारंपरिक अवधारणा से एक मनी बनती है।

लेखक के बारे में

रैना शुक्ला

रिचमंड यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट। पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और एबीपी न्यूज से हुआ न्यूज18 हिंदी तक पहुंचा। पर्यटक और देश की…और पढ़ें

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