2 बच्चों का पराठा और शाही हलवा की धूम, दंबग में खूब बिक रही है ये मुगलई डिश, तोए शाह उ बाबार्स मेले में लगी खाने वालों की भीड़

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मोहम्मद एकराम/धनबाद: झारखंड का डूबा हुआ शहर अब सिर्फ अपनी धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक पहचान और कोयला नगरी के नाम से ही नहीं, बल्कि अपने खास मुगलिया स्वाद के बारे में भी चर्चा में आया है। झरिया में स्थित कब्रगाह शाह बाबा के उर्स मेले में इन दिनों ऐसा शाही जायका लोगों को मिल रहा है जो सीधे मुगलकाल की रसोई की याद दिलाता है। मेले में मिलने वाला 2 किल वजनी मुगलिया पराठा और डॉगी डॉगी से भरपूर शाही हलवा स्वाद के दीवानों के लिए कोई खास तोहफ़े से कम नहीं है। हर साल लगने वाले मक्के शाह बाबा के उर्स मेले में जहां लोग मन्नत मिर्जा और बाबा की दरगाह पर चंद्रपोशी के लिए प्रतिमाएं रखते हैं, वहीं इस बार बंगले की अंगूठी को चार चांद लगा रहा है मुगलई तिकड़ी का अनोखा संगम। खास बात यह है कि होलाडीह इलाके में लागे स्टॉल पर मिलन वाला मुगलिया पराठा लोगों के बीच स्वाद के साथ ही आकर्षण का भी केंद्र बना हुआ है।

करीब 2 बच्चों के वजन वाला यह मुगलिया पराठा ना सिर्फ अपने आकार का बल्कि अपने स्वाद के लिए भी खास है। इसे असेम्बली पर आधारित परंपरागत तरीके से तैयार किया जाता है। पराठे की परतें अत्यंत असाधारण हैं, जबकि बाहर से यह प्रभाव कुकुरा रहता है। इसे बनाने में देसी घी और मीठे पदार्थों का उपयोग किया जाता है, जिससे इसका स्वाद और मसाला दूर से ही लोगों को अपनी ओर खींच लिया जाता है। मेले में आने वाला शायद कोई ही स्पेशल हो, जो इस पराठे को देखे बिना आगे बढ़ जाए।

इस अनोखे जायके के पीछे कलाकारों की मेहनत और परंपरा को जिंदा रखने का जज्बा छिपा है। स्टॉल टीचर शाह एटलाबाद के वे गिरिडीह के रहने वाले हैं और वर्षों से अलग-अलग देशों के उर्स मेलों में हिस्सा लेते आ रहे हैं। वे लखनऊ के कलाकारों से लखनवी मुगलई पराठा और सूजी का शाही हलवा बनाने की विधियाँ सीखते हैं। आज वही स्वाद वे पूरे देश के कई प्रतिष्ठित लोगों तक पहुंच रहे हैं।

मुगलिया पराठे के साथ वडोदरा जाने वाला रॉयल हलवा भी लोगों को खूब पसंद आ रहा है. यह हलवा खास पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है. इसमें खोवा, दूध, लगभग 10 किलो सूजी, 20 किलो आटे, 30 किलो आटा और बड़ी मात्रा में काजू, बादाम, तेल मसाला जैसे मसाले का इस्तेमाल किया जाता है. टुकड़ों पर आधारित ढांचे के बाद जब हलवा तैयार होता है, तो उसके टुकड़े और टुकड़े लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। हलवे की कीमत 200 रुपये प्रति किलो रखी गई है। इसे देखने के लिए लोगों की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं।

कलाकारों का कहना है कि स्टील के आँच पर पकाए गए परठे में जो कुरकुरापन और सीमेंट आता है, वह गैस के आँच पर संभव नहीं है। इसी तरह हलवे को आधारभूत ढांचे पर आधारित फर्मों से लंबे समय तक बरकरार रखा जाता है। यही वजह है कि ये मुगलिया स्वाद आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ है.

कई शाह बाबा उर्स मेले में अब सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं किया गया है, बल्कि यह सांस्कृतिक और खान-पान की महिमा से भी एक बड़ा आकर्षण बन रहा है। सूखा शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के सजावटी और दूसरे राज्यों से भी लोग इस मुगलकालीन जायके को देखने के लिए यहां पहुंच रहे हैं। स्वाद, परंपरा और आस्था का यह संगम मेले को एक खास पहचान दे रही है।

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