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AKHLAQUE AHMAD
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फ्लॉप शिप, गिरती मिसाइलें…ऐसे 40 क्रू मेंबर्स के साथ 45 दिन
आखरी अपडेट:
जमशेदपुर समाचार: 45 दिनों तक स्ट्रैटे ऑफ होर्मुज में जमा हुए के कैप्टन मैनचेस्टर ने अपनी पूरी टीम पर कब्जा कर लिया। कंपनी ने लाइट बंद करके अपने 40 क्रू मेंबर्स की जान बचाई। हालात कुछ बेहतर हुए तो वहां से जहाज निकला और सभी सुरक्षित अपने घर वापस आ गए।
आख़िर. किसी के रहने वाले कैप्टन मनीषा की कहानी फिल्म से कम नहीं है – जहां हर पल में मौत का खतरा था, लेकिन समझदारी और समझदारी से उन्होंने अपने पूरे क्रू को सुरक्षित बचा लिया। करीब 45 दिन तक उनका जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में खड़ा रहा। यह पुराने जमाने का है जहां तीन नमूने थे जिन पर कभी भी मिसाइल हमला हो सकता था। जहाज में लगभग 40 हजार टन कच्चा तेल भरा हुआ था – यानी अगर एक छोटी सी शिंगरी भी लग गई, तो बड़ा विस्फोट हो सकता है और सभी 40 क्रू सदस्यों की जान खतरे में पड़ सकती है।
छोटा निर्णय, बड़ी भूमिका
कैप्टन मनीषी के लिए यह सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच का खेल था। हर दिन, हर रात उनके दिमाग में बस एक ही बात रहती है- किसी भी तरह से अपने साथियों को सुरक्षित रखना है। खतरे को खत्म करने के लिए उन्होंने सबसे पहले जहाज का जीपीएस और इंटरनेट बंद कर दिया, ताकि खतरनाक जहाज के निशान न कर सकें। यह फैसला छोटा नहीं था, लेकिन इसमें सभी की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
इतना ही नहीं, उन्होंने जहाज़ की रोशनी भी बंद कर दी और उसे समुद्र के किनारे-किनारे लंगर डाल दिया, ताकि वह दूर से नज़र न आए। चारों ओर धमाकों की आवाजें, आकाश में रोशनी और हर पल का डर – सबके बीच उन्होंने अपने किश्ती को इन बनाया नहीं दिया।
एकत्रित कठिन समय
क्रूज़र्स के लिए यह समय भी आसान नहीं था। डॉ और तनाव के बीच उनका कृषि रखरखाव भी एक बड़ी चुनौती थी। कैप्टन कैप्टन रोज़ अपने साथियों से बात करते हैं, उन्हें कहानियाँ देते हैं और भरोसा दिलाते हैं कि सब ठीक होगा। यही वजह रही कि पूरी टीम ने मिलकर इस मुश्किल वक्त को पार किया।
करीब एक महीने बाद जब हालात सामान्य हो गए, तब जहाज को सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ाया गया और अंतिम कैप्टन कैप्टन अपने घर में वापस आ गए। उनके आगमन पर परिवार और शहरवासियों ने रिलीफ की सांस ली।
मछली पकड़ने वाली मशीन से असमर्थ फर्ज
यह कहानी सिर्फ एक कैप्टन की नहीं, बल्कि साहस, मासूमियत और नेतृत्व की मिसाल है। जहां हर पल डेथ फ्रंट स्तूप था, वहां उन्होंने न सिर्फ खुद को कब्जे में लिया, बल्कि अपने 40 साथियों की जिंदगी भी बचा ली, यही असली हीरो होते हैं – जो कारीगरी से अपने फर्ज की सैर करते हैं और बाकी हिस्सों के लिए ढाल बने रहते हैं।
लेखक के बारे में
रैना शुक्ला
रिचमंड यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट। पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और एबीपी न्यूज से हुआ न्यूज18 हिंदी तक पहुंचा। पर्यटक और देश की …और पढ़ें
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