पाई फ्लावर्स ने बदली पलामू के किसान की किस्मत, कम देखने में हुई इतनी कमाई, साल में 4 तुड़ाई

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पलामू के किसानों की किस्मत में पलामू के फूल ने बनाई किस्मत, कम देखने में हुई भारी कमाई

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गेंदे की खेती: किसान जब पारंपरिक बीजों से अलग हटकर कुछ उगाते हैं तो उनका फायदा भी उन्हें एक ही प्रकार से होता है। जैसे पलामू के किसान रत्न कुमार अपने पिता की खेती को आगे बढ़ा रहे हैं और दो स्वादिष्ट गेंदा उगा रहे हैं। इससे उन्हें ट्रेडिशनल बिजनेस की तुलना में काफी फायदा होता है।

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पलामू. झारखंड और बिहार के अधिकांश किसान आज भी पारंपरिक खेती – जैसे धान और ज़मीन – पर प्रतिबंधित हैं। लेकिन खाली समय के साथ कुछ किसान ऐसे भी हैं,घोड़ा परंपरा से हटकर नई राह छड़ी और अपनी मेहनत से सफलता की नई कहानी लिख दी। गढ़वा जिले के गरौता मंझियांव गांव के एक किसान ने बदलाव कर एक नई मिसाल पेश की है।

पौधों से होता है अधिक उत्पाद
असली, गढ़वा जिले के मंझियांव खंड के रहने वाले रमाशंकर माली गेंदे के फूलों की खेती की शुरुआत करने वाले हैं। अब उनकी खेती अंकित कुमार पिछले 10 वर्षों से संभाले हुए हैं। शुरुआत में यह प्रयोग था, लेकिन आज यही उनकी मुख्य आय का जरिया बन गया है। रमाशंकर माली के चित्र अंकित हैं कि पारंपरिक खेती में जहां लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है, वहीं फूलों की खेती ने अपनी राय को कई गुना बढ़ा दिया है।

उन्होंने कहा कि करीब 2 जंगली जमीन में वे गेंदे की खेती करते हैं। एक साल में चार बार फ़सल लेने का मौका मिलता है, जिससे कॉमर्स का चक्र लगातार बना रहता है। फूलों के औषधियों के प्रयोग से वे बाहर से बचते हैं और समय-समय पर औषधियों का प्रयोग कर फल को स्थिर से बचाते हैं।

अच्छी व्युत्पत्ति हो गई है
बाजार की बात करें तो उनके फूल स्थानीय बाजार के साथ सासाराम तक जाते हैं, जहां उनकी खुद की दुकान भी है। कीमत की बात करें तो एक कौड़ी का फूल कभी 200-300 रुपए में बिकता है, तो कभी बढ़ने पर भी यही कीमत 1000 रुपए तक पहुंच जाती है। औसत वे प्रतिदिन 10 कौड़ी फूल बेचते हैं, जिससे उनकी अच्छी व्याख्या हो जाती है।

अंकित में कहा गया है कि इस खेती में पूरी तरह से लाभ कमाया जा सकता है, लेकिन मेहनत और सही देखभाल से अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। चार महीने की एक फल में 4 से 5 बार तुड़ाई होती है, जिससे बार-बार आय का मौका मिलता है।

कुछ अलग करें तो होगा अधिकतम लाभ
आज अंकित कुमार उन किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं, जो पारंपरिक खेती से आगे कुछ नया करना चाहते हैं। उनकी यह सफलता कहानी कहती है कि अगर सोच और मेहनत को सही दिशा में बदल दिया जाए, तो खेती का भी बड़ा फायदा बन सकता है। अगर कुछ किया जाए तो पारंपरिक पारंपरिक से अलग हटकर मिल सकता है।

लेखक के बारे में

रैना शुक्ला

रिचमंड यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट। पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और एबीपी न्यूज से हुआ न्यूज18 हिंदी तक पहुंचा। पर्यटक और देश की …और पढ़ें

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