खेती के टिप्स: खेत की मेड़ पर ये फसलें, दोगुनी कमाई के साथ मिलेगा गजब का फायदा

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फार्म बाउंड्री क्रॉप फार्मिंग: देवघर के कृषि विशेषज्ञ वकील यादव ने किसानों को खेत की मेड़ का बेहतर उपयोग करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि मेध पर अरहर, मक्का, नींबू, पपीता और ओल जैसी फसलें और साधन बिना अतिरिक्त जमीन और निवेश के लगाए जा सकते हैं। इससे एक ओर अतिरिक्त उत्पादन होगा, वहीं दूसरी ओर वर्षा के दौरान मिट्टी का कटाव भी कम होगा।

देवघर: झारखंड के अधिकांश खेत मेधानुमा पाए जाते हैं। खेती के दौरान पूरे खेत में धान, खेत या अलग-अलग फसलों का उत्पादन होता है। लेकिन खेत के चारों ओर बनी मेढ़ अक्सर खाली छोड़ दी जाती है। ऐसे में खेत का एक हिस्सा बिना उपयोग के रह जाता है। कृषि विशेषज्ञ का कहना है कि यदि किसान मेढ़ का सही उपयोग करें, तो बिना एक इंच जमीन को भी बढ़ाया जा सकता है।

मेढ पर दूसरी फसलें या फलदार उपाय
देवघर के प्रगतिशील किसान और कृषि विशेषज्ञ वकील यादव कहते हैं कि झारखंड के ज्यादातर किसान धान और कृषि उद्योग पारंपरिक खेती पर ही निर्भर हैं। इससे पूरे साल अच्छी आय नहीं हो सकी। लेकिन अगर खेत की मेढ़ पर दूसरी फसल या फलदार पौधे लगाए जाते हैं, तो उसी खेत से अतिरिक्त उत्पादन और अतिरिक्त कमाई दोनों हो सकती है। उन्होंने कहा कि खेत की मेढ़ पहले से बनी है। इसलिए इसके लिए अलग से जमीन की जरूरत नहीं है. किसान बिना अतिरिक्त भूमि की खेती का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।

मेढ पर उपाय ये फल और उपाय
कृषि विशेषज्ञ के अनुसार, किसान खेत की मेढ़ पर अरहर लगा सकते हैं। इससे दाल का उत्पादन होगा। वहीं मक्का के साथ अनाज के लिए चारा भी मिल जाएगा। इसके अलावा किसान नींबू, पपीता और ओल जैसे फलदार और कंद वाले उपचार भी लगाए जा सकते हैं। बाज़ार में अच्छी मांग रहती है। ऑल कम जगह में अच्छा निर्माण होता है और इसकी कीमत भी बेहतर होती है। कुछ समय बाद ये किसान किसान नियमित आय का स्रोत बन सकते हैं। इस तरह एक ही खेत में मुख्य फसल के साथ मेढ़ पर लगी मशीन और ऑटोमोबाइल से भी कमाई होगी। इससे किसानों की कुल आय बेरोजगार।

बारिश में मिट्टी का कटाव भी कम होगा
वकील यादव ने बताया कि मेध उपचार का एक और बड़ा फायदा है। इससे मेढ़ मजबूत बना रहता है। बारिश के समय मिट्टी का कटव कम होता है। पुरावशेषों की जड़ों को ज्वालामुखी से ‍मिशालति ‍लिखाया जाता है। इस खेत की मिट्टी की भव्यता से बच जाता है। उन्होंने कहा कि मेध पर उपचार खेत की सीमा से भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। साथ ही खाली जगह पर इंद्रधनुष भी कम उगते हैं। इससे किसानों की मेहनत और खर्च दोनों कम होते हैं।

बिना अतिरिक्त निवेश वृद्धि हो सकती है
कृषि विशेषज्ञ का कहना है कि खेती में पारंपरिक सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है। खेत के हर हिस्से का सही उपयोग करना चाहिए। मेढ़ को खाली छोड़ने के बजाय वहां ऐसी फसल और औषधों का प्रयोग करना चाहिए, बाजार में अच्छी मांग हो और लंबे समय तक आय होती रहे। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि इस छोटे से बदलाव को अपनाकर बिना अतिरिक्त निवेश के भी शामिल किया जा सकता है। खेत की मेड़ अब सिर्फ खेत की सीमा तय करने का साधन नहीं है, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आय को मजबूत करना भी संभव है।

लेखक के बारे में

अमिता किशोर

न्यूज़18इंडिया में रेस्तरां हैं। आजतक रिपोर्टर के मुताबिक, रिश्तों की शुरुआत फिर से सहारा टाइम, जी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़े हुए हैं। टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने के…और पढ़ें

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